दरिया-ए-नील और मिस्र की कुवांरी लड़की की क़ुर्बानी देने का एक हैरतअंगेज़ क़िस्सा देखें

अट्ठारह हिजरी में हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु को चार हज़ार का लश्कर देकर मिस्र रवाना किया, मिस्र का हाक़िम मक़ोक़स था, उसने बेतहाशा फौज जमा कर ली, क़लादी हद दर्जे महफूज़ था.

इन हालात की ख़बर अम्र बिन आस ने हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को दी तो उन्होंने दस हज़ार फ़ौज और भेजीं और उनके साथ बुज़ुर्ग सहाबी हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम रज़िअल्लाहु अन्हु को सालार मुक़र्रर किया…, उनके हाथ पर क़िला फ़तेह हुआ.

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इसके बाद इसकारिया की बारी आई, इसकारिया की फ़तेह के बाद हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु को मिस्र का गवर्नर मुक़र्रर किया…।

दरिया-ए-नील मिस्र का एक बहुत बड़ा दरिया था, एक दिन बहुत से मिस्री हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु के पास आए और कहा: “इस साल दरिया-ए-नील में पानी बहुत कम रह गया है, हमारी फसलें बर्बाद हो रही हैं… पुराने ज़माने से ये रस्म चली आ रही कि जब दरिया-ए-नील में पानी कम हो जाता है तो हम एक मुक़र्रर तारीख़ को एक कुवांरी लड़की चुन लेते हैं.

उसके वालिदैन की मर्ज़ी से उसे निहायत क़ीमती ज़ेवर और कपड़े पहनाकर दुल्हन की तरहा बना देते हैं, फिर उसे दरिया-ए-नील में गिरा देते हैं, इस तरहा दरिया में पानी चढ़ जाता है और इर्द गिर्द के तमाम इलाक़े सैराब हो जाते हैं…। अगर आप इजाज़त दें तो हम अपनी ये रस्म अदा करें.

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हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु ने कहा “ये तो बड़ी ज़ालिमाना रस्म है…,” जवाब में मिस्रियों ने कहा “अगर आपने हमें ये रस्म अदा करने की इजाज़त ना दी तो मुल्क़ में क़हत (सूख़ा) पड़ जाएगा… और हम तबाह हो जाएँगे…।”
हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया तुम लोग नादान हो, अल्लाह के हुक्म के बग़ैर दरिया में पानी हरग़िज़ कम या ज़्यादा नहीं हो सकता, इस्लाम ऐसी फ़िज़ूल की रस्मों को मिटाने के लिये आया है, मैं तुम्हें एक बेगुनाह लड़की पर ज़ुल्‍म करने की इजाज़त नहीं दूंगा.

मिस्री मायूस होकर लौट गए… इत्तेफ़ाक़ से दरिया-ए-नील में पानी कम हो गया… लोग क़हत के डर से वतन छोड़ने की तैयारी करने लगे…। हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु ने ये सारा क़िस्सा हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को लिख भेजा, उन्होंने जवाब में लिक्खा “अल्हमदुलिल्लाह आपने मिस्रियों को बिल्कुल ठीक जवाब दिया, इस्लाम वाक़ई ऐसी फ़िज़ूल रस्मों को मिटाने के लिये आया है…।

मैं एक ख़त भेज रहा हूँ इसको दरिया-ए-नील में डाल देना…।”
हज़रत अम्र बिन आस रजियल्लाहु अन्हु ने ख़त को दरिया में डालने से पहले उसकी इबारत पढ़ी, उसके अल्फ़ाज़ ये थे…
“ऐ नील! अगर तू अपने इख़्तियार से बह रहा है तो मत बह… और अगर तू अल्लाह तआला के हुक्म से बह रहा है तो मैं अल्लाह तआला के हुज़ूर दुआ करता हूँ कि वो तुझे पहले की तरहा ज़्यादा पानी के साथ जारी कर दे…।” ये रुक़्क़ा दरिया में डाल दिया गया…।

दूसरे दिन जब मिस्र के लोग सोकर उट्ठे तो उन्होंने अल्लाह की क़ुदरत का अजीब नज़ारा देखा, दरिया का पानी कई गज़ ऊपर चढ़ गया था, किनारों से निकलकर आस-पास के इलाकों को सैराब कर रहा था, इतना ज़्यादा पानी दरिया-ए-नील में कभी नज़र नहीं आया था, ये नज़ारा देखकर हज़ारों मिस्री मुसलमान हो गए, और वो ज़ालिमाना रस्म हमेशा के लिये ख़त्म हो गई…।