क्या आप जानते हैं, ज़िना क्या है, और इसकी इस्लाम में क्या सज़ाएं हैं..?

मर्द अगर किसी ऐसी महिला के साथ हमबिस्तरी करे जो उसकी बीबी ना हो तो यह इस्लाम में जिना कहलाता है. जिना साथ सोने को ही नही बल्कि छूने भी जिना का एक हिस्सा है. किसी पराई औरत को देखना आँखों का ज़िना है. इस्लाम में ज़िना को एक बहुत बड़ा गुनाह माना गया है.

दुनिया में तो इस्लाम ने ऐसा करने वालो की सज़ा रखी ही है इसके आलावा मरने के बाद अल्लाह इसकी सख्त सज़ा देगा. अल्लाह क़ुरआन में फरमाता है وَلا تَقْرَبُوا الزِّنَى और तुम ज़िना के क़रीब भी मत जाओ. यौन-अपराध की समस्या को इस्लाम में बड़ी सफलता के साथ हल किया गया है. इस संबंध में तीन स्तरों पर काम किया गया है.

१. आध्यात्मिक व नैतिक स्तर २. सामाजिक स्तर ३. क़ानूनी स्तर. इस्लाम की अवधारणा है कि समाज के चरित्रवान होने के लिए व्यक्ति का चरित्रवान होना अनिवार्य है और व्यक्ति के चरित्रवान होने के लिए शर्त है कि उसके अन्दर के इन्सान को चरित्रवान होना.

इस्लाम के मुताबिक यौन-अनाचार को अपराध से पहले पाप बताया गया है. यह ईश्वर और ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्ल॰ की नाफ़रमानी है और इसके लिए मरन उपरांत परलोक में कठोर पीड़ादायक दंड दिया जाएगा. ईश्वर ने हया, लज्जा और शील-रक्षा के जो गुण इन्सानों में प्राकृतिक रूप से रखे हैं.

उन्हें प्रबल सक्रिय और विकसित करने के उद्देश्य से क़ुरआन और हदीस पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों में बेशुमार शिक्षाएँ साथ में आदेश दिए गए हैं. प्रत्येक साल एक महीने के रोज़े अनिवार्य करके खाने-पीने के साथ-साथ यौन-संभोग को भी भोर से सूर्यास्त तक हराम क़रार दिया गया है. इस दौरान इतना आत्मिक बल पैदा कर दिया जाता है कि पुरुष और स्त्री कामुकता व यौन-उत्तेजना पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो जाएँ.

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने फ़रमाया है कि अगर तुम दो चीज़ों की हिफ़ाज़त की ज़मानत दो तो मैं तुम्हारे लिए जन्नत की ज़मानत देता हूँ. पहली वह जो तुम्हारे दो जबड़ों के बीच है अर्थात ज़बान और दूसरी वह जो तुम्हारी रानों के बीच है अर्थात् गुप्तांग.

इस शिक्षा में तथ्य है कि छोटे-बड़े अधिकांश पाप झूठ, गाली-गलौज, दूसरों का अपमान, चुग़ली, परनिन्दा (ग़ीबत), ग़लत आरोप, बुरी व गंदी वार्ता, दूसरों का चरित्र हनन आदि ज़बान से होते हैं और यौन-अनाचार, यौन-दुष्कर्म, अनैतिक व अवैध संभोग गुप्तांगों से होते है.

कुरान में अल्लाह फ़रमाता है ज़िना के पास भी ना जाना, बेशक वो बेहयाई है और बुरी राह है. ज़िना की सज़ा और अज़ाब, अगर ज़िना करने वाले शादी शुदा हो तो उन्हें खुले मैदान में पत्थर मार कर मार डाला जाये और अगर कुंवारे हो तो 100 कोड़े मारे जाये. बुखारी शरीफ जो स्त्री बहुत बारीक पारदर्शी वस्त्र पहने वह जन्नत में जाना तो बहुत दूर की बात स्वर्ग की ख़ुशबू भी नहीं पाएगी. यह शिक्षा पैग़म्बर (सल्ल॰) की दी हुई है.

क़ुरआन में मुस्लिम समुदाय को आदेश है भलाइयों का हुक्म देने और बुराइयों को रोकने का 3:104. इस काम को मुस्लिम समुदाय का कर्तव्य बताते हुए उसे उत्तम गिरोह कहा गया है 3:110 तथा इसे उसका गुण और विशेषता कहा गया है 9:71.

जरुरत पड़ने पर औरतें खुले चेहरे के साथ बाहर निकलें तो उन्हें देखकर पुरुषों में या पुरुषों को देखकर औरतों में दुर्भावना पैदा होने की संभावना होती है इसलिए क़ुरआन में अल्लाह का हुक्म है कि अपनी निगाहें नीची रखा करो 24:30. पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने शिक्षा दी अचानक निगाह पड़ सकती है यह एक व्यावहारिक तथ्य है तो निगाह हटा लो. दोबारा-तिबारा निगाह मत डालो.

पहली निगाह तुम्हारी अपनी थी इसके बाद की निगाहें शैतान की होंगी. अर्थात् तुम्हे यहाँ से ग़लत रास्ते पर डालने के लिए शैतान का काम शुरू हो जाता है. पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने शिक्षा दी है कि जब दो जवान पुरुष व स्त्री एकांत में न रहें. जब वह एकांत में होते हैं तब वह केवल दो ही नहीं होते बल्कि उनके बीच एक तीसरा भी होता है और वह है शैतान.

अर्थात् ऐसे मौके पर शैतान दोनों की काम-भावना को उकसा-उकसा कर अनाचार की ओर खींचने में लग जाता है. इस्लाम, क़ानूनी सक्रियता से पहले ज़्यादातर काम अपराध हो जाने से बहुत पहले शुरू कर देता है यानी उपरोक्त दो आध्यात्मिक व सामाजिक स्तरों पर इतना अधिक काम कर चुकता है कि अपराध की घटनाएँ लगभग 95-98 प्रतिशत ख़त्म हो जाती हैं. बाक़ी 2-5 प्रतिशत घटनाओं के लिए सख़्त क़ानून और कठोरतम दंड का प्रावधान करता है.

दोषी पुरुष-स्त्री दोनों या कोई एक यदि वह विवाहित हैं तो पत्थर मार-मारकर हलाक कर देने यानि मार देने की सज़ा दी जाती है. और यदि दोनों या कोई एक अविवाहित हो तो सौ कोड़े मारने की सज़ा बताई गई है. इसके आलावा इन सज़ाओं में कुछ कमी-बेशी नहीं की जा सकती. यही क़ानून इस्लामी राज्य-व्यवस्था में हमेशा-हमेश लागू होता रहेगा. इसके आलावा सज़ाएँ खुलेआम जनसामान्य के सामने देने का आदेश है. जिससे लोग दुष्कर्म से बचने के लिए डर और ख़ौफ़ रखें.