आखिर वो क्या वजह है जिससे सऊदी और बहरीन में राजनैतिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कड़ा व्यवहार अपनाया जा रहा है

आले सऊद शासन के सुरक्षा कर्मियों द्वारा सऊदी उपदेशकों को गिरफ्तार किया गया है. इन में उपदेशक शैख़ अली बिन सईद अलग़ामेदी, उनके भाई और 5 अन्य उपदेशक शामिल है. वहीँ दूसरी ओर बहरीन के आले ख़लीफ़ा शासन के सुरक्षा कर्मियों द्वारा बहरीन धर्मगुरु शैख़ मोहम्मद सईद अलअराद को गिरफ्तार कर लिया गया है.

बहरीन धर्मगुरु शैख़ मोहम्मद सईद अलअराद को एक साल की कैद की सजा और जुर्माना भी लगाया गया है. उन पर यह कार्रवाई इसलिए की गई है क्योंकि उन्होंने ट्वीटर पर एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद घटी एक अहम घटना पर टिप्पणी की थी.

इन घटनाओं के बाद एक नजरिये से यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सऊदी अरब में आले सऊद शासन ने अपेक्षाकृत सामाजिक आज़ादी देने और उसे पश्चिमी रंग रूप देने के लिए बहरीन जैसे देश से प्रेरणा ली है तो वहीँ दूसरी तरफ आले ख़लीफ़ा शासन बहरीन ने सऊदी अरब से राजनैतिक व धार्मिक घुटन पैदा करने की प्रेरणा ली है.

बहरीन के आले ख़लीफ़ा शासन द्वारा राजनैतिक व धार्मिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और उनके बारे में अन्यायपूर्ण आदेश जारी करने को लेकर यूरोपीय संसद के कुछ सदस्यों द्वारा इस घटना की कड़ी निंदा की है. बता दें कि यह घटना ऐसे समय में हुई है जब बहरीन और योरोपीयन के संबंध हाल ही में अच्छे होते नजर आ रहे है.

संयुक्त राष्ट्र संघ

वहीँ सऊदी अरब और बहरीन में होने वाली ऐसे घटनाओं के बाद ह्यूमन राइट्स वॉच या एम्नेस्टी इंटरनैश्नल जैसे ग़ैर सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने दोनों देशों को मानवाधिकार के सबसे बड़े हननकर्ता देशों की लिस्ट में शामिल किया है. इसके बावजूद भी संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद ने इस तरह की घटनाओं की निंदा तक नहीं की हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि सऊदी और बहरीन में मानवाधिकार के खुले उल्लंघन की एक बड़ी वजह संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके सबसे अहम स्तंभ सुरक्षा परिषद द्वारा इन दोनों देशों में होने वाले मानवाधिकार के खुले उल्लंघन के संबंध में कार्यवाही तो दूर निंदा तक नहीं करने के उदासीन रवैये का कारण है.